पटना ऐसे तो बिहार की तकदीर बदलने से रही। 'पेट्रो बिहार' का सपना जिंदा हो-होकर मर रहा है। पहले केयर्न एनर्जी लिमिटेड ने खूब सपने दिखाये। अंतत: हवा-हवाई। और सरकार ने ओएनजीसी व टीपीएल से समझौता किया, तो उसे एनओसी (अनापत्ति प्रमाणपत्र) नहीं मिल रही है। इन कंपनियों को चंपारण (बेतिया) के 2227 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में प्राकृतिक तेल व गैस तलाशना है।
कंपनियों (तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग, टाटा पेट्रोडाइम लिमिटेड) ने करार के मुताबिक फौरन बेस कैम्प बनाये। बहाली की। मशीनें आयीं। पर तेल की तलाश शुरू नहीं हुई है। एनओसी नहीं मिली है। कंपनी के करीब 200 कामगार चुपचाप बैठे है। वेतन पर बड़ी रकम खर्च हो रही है। हां, खाली वक्त में कंपनी सामाजिक दायित्व जरूर निभा रही है। चश्मा बांट रही है; मुफ्त चिकित्सा कैंप लगा रही है।
उनका सरकार के साथ 29 अक्टूबर 08 को एकरारनामा हुआ था। सरकार खूब झूमी थी। 'पेट्रो बिहार' की मरती उम्मीद एक बार फिर जिंदा जो हुई थी। सरकार ने केयर्न लिमिटेड द्वारा मिले गम को भुला दिया। खनन एवं भू-तत्व मंत्री रामचंद्र सहनी ने इसे प्रदेश के विकास को नई उछाल देने का गौरवपूर्ण दिन कहा था। नवम्बर 08 से दुनिया की सर्वोत्तम तकनीक के बूते किस्मत का यह खेल (तेल-गैस की तलाश) खेला जाना था। मगर सरकारी आदमी व उसके पेंच में लगभग सब कुछ फंसा हुआ है। हालांकि चाहे स्थानीय प्रशासन हो या राज्य मुख्यालय, कोई भी इसे बतौर कसूर कबूलने को तैयार नहीं है। अव्वल तो दोनों नहीं मानता कि कोई चूक भी हुई है। दोनों के अनुसार 'कार्य प्रगति पर है। जल्द मुकाम पायेगा।' लेकिन एनओसी के लिए यह देरी विकास व समृद्धि के मुतल्लिक बांधी गयी बड़ी आस के टूटने जैसी ही है। यह बड़ा सवाल है कि क्या बिहार की खुशहाली के कारक जमींदोज ही रहेगे?
प्रदेश के साथ 47 वर्ष से यह विडंबना है। 'पेट्रो बिहार' का सपना जिंदा हो-होकर मरता रहा है। पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री के रूप में संतोष गंगवार ने सूबे के 15,550 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में प्राकृतिक तेल व गैस होने की बात कही थी। दरभंगा, समस्तीपुर, मुंगेर, बेगूसराय, पटना, खगड़िया, सहरसा भागलपुर, मधेपुरा, सुपौल, मधुबनी व सीतामढ़ी जिले में इसके प्रारंभिक संकेत मिलते रहे है। 1962 में जब तलाश का काम शुरू हुआ, तब सोवियत रूस की मदद ली गयी थी। लेकिन इस कालखंड में ऐसे भी नमूने रहे, जिसने इस मोर्चे पर बिहार को घोर उपेक्षा दर्शाया। सत्तर के दशक में गंडक बेसिन के बेतिया, हाइड्रोकार्बन वाले क्षेत्र योगापट्टी (बेतिया) एवं ठुल्लीपट्टी (मधुबनी) में डीप ड्रीलिंग हुई। 1980 से 1992 के बीच डीप ड्रीलिंग परियोजना के तहत फिर मधुबनी, सीतामढ़ी, दरभंगा, बेतिया, वायसी, पूर्णिया, किशनगंज, बहादुरगंज, सुगौली आदि स्थानों पर कैम्प लगा। मशीनें आयीं। सेरेमिक रिकार्डिग, भूतल की तस्वीरे। किंतु 1987 में ड्रीलिंग रोक दी गयी। मशीनें असम भेज दी गयीं। तर्क सुनिये-'बिहार में पेट्रो पदार्थो की तलाश मुश्किल व खर्चीला है। उपलब्धता की संभावना नहीं है।' बिहार को यह तर्क कई बार सुनाया गया है। कमोवेश इसी तर्क पर केयर्न लिमिटेड ने भी हाथ मोड़ लिये। मगर कंपनी व एजेंसियां यह नहीं बतातीं कि क्या सर्वेक्षण रिपोर्ट झूठे हैं?
ओएनजीसी के नरेद्र कुमार वर्मा को ऐसे सवालों पर ऐतराज है। वे इसे यूं स्पष्ट करते हैं-'यह बेहद मुश्किल काम है। इसे 50-100 करोड़ का महंगा जुआ समझिये। तलाश के कई-कई चरण होते है। एक की सर्वे रिपोर्ट, दूसरे स्टेज में बिल्कुल बदल भी जाती है। यह किस्मत का खेल है। हां, पुरानी तकनीक नाकामयाबी की बड़ी वजह हो सकती है।' उनका दावा है-'हम लेटेस्ट टेक्नालाजी इस्तेमाल करेगे। पूरा भरोसा है कि बिहार, भारत के तेल मानचित्र पर आयेगा।'
लेकिन पहले एनओसी तो मिले। सरकारी आदमी का वह मिजाज तो मरे, जो किसी भी बड़ी गुंजाइश को रूटीन टाईप लेता है, पेंच में फंसा देता है। खनन एवं भू-तत्व मंत्री कहते हैं-'ऐसा नहीं होने दिया जायेगा।'
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